कुआँ, दीवारें और आग आज भी गवाह — 42 वर्षों बाद भी मासूमों के हत्यारे आज़ाद

रेवाड़ी, 3 फरवरी। 1984 के नरसंहार की खामोश गवाह बनी होंद चिल्लड़ की धरती आज एक बार फिर इंसाफ़ की पुकार से गूंज उठी। 42 वर्ष पहले जहाँ मानवता को तार-तार कर दिया गया था, उसी धरती पर आज शहीदों की स्मृति में श्री सुखमनी साहिब का पाठ और अरदास की गई।इस कार्यक्रम का नेतृत्व होंद चिल्लड़ तालमेल कमेटी के प्रधान और पायल विधानसभा क्षेत्र से विधायक इंजीनियर मनविंदर सिंह गियासपुरा ने किया। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि 32 निर्दोष सिखों का नरसंहार आज भी भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक काला धब्बा है, क्योंकि 42 वर्ष बीत जाने के बावजूद दोषियों को सज़ा नहीं मिली।
गियासपुरा ने कहा कि यह वही होंद चिल्लड़ है जहाँ 2 वर्ष के मासूम बच्चे को दीवारों से पटक-पटक कर मार दिया गया, 70 वर्ष के बुज़ुर्गों को तेल डालकर ज़िंदा जला दिया गया और सैनिक इंद्रजीत सिंह को सेना की वर्दी में होने के बावजूद मौत के घाट उतार दिया गया। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ हत्याएँ नहीं थीं, बल्कि कांग्रेस सरकार की नाक के नीचे मानवता की हत्या थी।उन्होंने बताया कि नरसंहार के समय गाँव में विवाह समारोह चल रहा था — एक ओर शहनाइयाँ बज रही थीं, दूसरी ओर मासूमों की चीखें आसमान चीर रही थीं, लेकिन प्रशासन, पुलिस और सत्ता पूरी तरह ग़ायब थी।
कार्यक्रम के दौरान संगत को वे सभी स्थान दिखाए गए जहाँ दरिंदगी की सारी हदें पार की गई थीं — वह दीवार जहाँ एक मासूम की जान ली गई और वह स्थान जहाँ बुज़ुर्गों को आग के हवाले किया गया।इस अवसर पर सुरजीत कौर, जिन्होंने नरसंहार के दौरान अपने 12 परिजनों को खो दिया था, भी उपस्थित रहीं। उन्होंने संगत को वह कुआँ दिखाया, जिसमें दरिंदों द्वारा 32 निर्दोष सिखों को जला कर फेंक दिया गया था। वह कुआँ आज भी इंसाफ़ की हत्या की मूक गवाही दे रहा है।इंजीनियर गियासपुरा ने बताया कि इस मामले में एस.पी. राम किशोर, डी.एस.पी. राम भग्ग, राम कुमार सहित अन्य के ख़िलाफ़ 2017 से याचिका माननीय पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित है, लेकिन अदालतों की ओर से केवल तारीख़ें ही मिल रही हैं। अब अगली तारीख़ 10 अप्रैल 2026 दी गई है, जो न्याय व्यवस्था की सुस्ती को दर्शाती है।
इंसाफ़ न मिलने के विरोध में कार्यक्रम के दौरान भाजपा सरकार की चुप्पी के ख़िलाफ़ प्रतीकात्मक रूप से पुतले जलाए गए। संगत ने एक स्वर में सवाल उठाया —
“क्या यही आज़ाद भारत है, जहाँ सैनिक भी सुरक्षित नहीं और मासूमों के हत्यारे आज भी आज़ाद घूम रहे हैं?”होंद चिल्लड़ का यह कार्यक्रम सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि 42 वर्षों से दबाई गई चीख़ का ऐलान था — यह संदेश कि शहीदों का खून व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा और इंसाफ़ मिलने तक यह संघर्ष जारी रहेगा।
इस अवसर पर सुरजीत कौर रेवाड़ी, गोपाल दास रेवाड़ी, गुरजंट सिंह करनाल, अविनाशप्रीत सिंह बैंस, बूटा सिंह राणो, कवलजीत सिंह बिट्टू, मनजीत सिंह धामी, एस.डी.ओ. निर्मल सिंह, बी.के. सिंह, सुखविंदर सिंह नोना, मनजीत सिंह पी.ए., अमरदीप सिंह सरपंच कूहली खुर्द, हरदीप सिंह अजनौद, गुरजिंदर सिंह निक्का, दलविंदर सिंह झाबेवाल आदि उपस्थित थे।
